Sunday, 1 April 2018

२ अप्रैल के भारत बंद के अम्बेडकरी आह्वान को, स्तालिनवादी वाम ने दिया समर्थन

- रजिंदर कुमार/ २.४.२०१८ 

अनूसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम १९८९, के विभिन्न प्रावधानों, विशेष रूप से धारा १८, जो आरोपी के अग्रिम जमानत के अधिकार को बाधित करती है, की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ विभिन्न अस्मितावादी, अम्बेडकरी संगठनों ने २ अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया है. अपनी अस्मिता को किसी तरह बचाने की जुगत में जुटी विभिन्न स्तालिनवादी और माओवादी पार्टियों ने भी इस बंद को समर्थन दिया है.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी भाजपा सरकार ने अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन करते हुए, २०१६ में नए अपराधों को इसमें शामिल करने के साथ ही, दंड प्रक्रिया को और त्वरित बनाने के लिए भी नए प्रावधान इस अधिनियम में जोड़े थे. ये संशोधित प्रावधान २६ जनवरी २०१६ से लागू हो गए थे.

2 ਅਪ੍ਰੈਲ ਦੇ ਭਾਰਤ ਬੰਦ ਦੇ ਸੱਦੇ ਨੂੰ, ਸਤਾਲਿਨਵਾਦੀ ਖੱਬੇਪਖ ਨੇ ਦਿੱਤੀ ਹਿਮਾਇਤ

-ਰਜਿੰਦਰ/ 02.04.18

ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤੀ ਅਤੇ ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਨਜਾਤੀ (ਅੱਤਿਆਚਾਰ ਨਿਵਾਰਨ) ਐਕਟ 1989, ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਪ੍ਰਬੰਧਾਂ, ਖਾਸ ਰੂਪ ਨਾਲ਼ ਧਾਰਾ 18, ਜੋ ਮੁਲਜ਼ਮ ਦੀ ਐਂਟੀਸੀਪੇਟਰੀ ਜਮਾਨਤ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰ ‘ਤੇ ਰੋਕ ਲਾਉਂਦੀ ਹੈ, ਦੀ ਸਵਿੰਧਾਨਕਤਾ ਨੂੰ ਚੁਣੌਤੀ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਅਰਜੀ ‘ਤੇ ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਦੇ ਫੈਸਲੇ ਵਿਰੁੱਧ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਪਹਿਚਾਣਵਾਦੀ, ਅੰਬੇਡਕਰਵਾਦੀ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਨੇ 2 ਅਪ੍ਰੈਲ ਨੂੰ ਭਾਰਤ ਬੰਦ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ, ਆਪਣੀ ਪਹਿਚਾਣ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਤਰਾਂ ਬਚਾਉਣ ਦੀ ਜੁਗਤ ‘ਚ ਲੱਗੀਆਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਸਤਾਲਿਨਵਾਦੀ ਅਤੇ ਮਾਓਵਾਦੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਬੰਦ ਦੀ ਹਿਮਾਇਤ ਕੀਤੀ ਹੈI

ਨਰਿੰਦਰ ਮੋਦੀ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਾਲੀ ਸੱਜੇਪੱਖੀ ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਐਕਟ ਦੇ ਪ੍ਰਬੰਧਾਂ ‘ਚ ਸੋਧ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, 2016 ‘ਚ ਨਵੇਂ ਅਪਰਾਧਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ‘ਚ ਸ਼ਾਮਿਲ ਕਰਨ ਦੇ ਨਾਲ਼ ਹੀ, ਦੰਡ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਹੋਰ ਤੇਜ਼ ਕਰਨ ਲਈ ਨਵੇਂ ਪ੍ਰਬੰਧ ਇਸ ਐਕਟ ‘ਚ ਜੋੜੇ ਸਨI ਇਹ ਸੋਧੇ ਹੋਏ ਪ੍ਰਬੰਧ 26 ਜਨਵਰੀ 2016 ਤੋਂ ਲਾਗੂ ਹੋ ਗਏ ਸਨI

Wednesday, 28 March 2018

झारखण्ड विधानसभा में, राज्यसभा के लिए हुए मतदान ने, स्तालिनवादियों को नंगा किया!

- अनुराग पाठक एवं राजेश त्यागी/ २९.३.२०१८

झारखण्ड विधानसभा से राज्यसभा की दो सीटों के लिए, इस सप्ताह हुए मतदान में, स्तालिनवादी वाम की दो पार्टियों, भाकपा माले और मार्क्सवादी समन्वय समिति (मासस) के एकल विधायकों द्वारा किए गए कुटिल मतदान ने, सीधे भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में संतुलन बना दिया.

राजधनवार से माले के विधायक राजकुमार यादव और निरसा से मासस के अरूप चटर्जी पर भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में कुटिलता से वोट प्रयोग करने और उनकी जीत में मदद पहुंचाने के सीधे आरोप के बाद, इन दोनों विधायकों ने अपने फ़र्जी स्पष्टीकरण रखे.

जहां माले विधायक ने इसे वोट डालने में ‘गलती’ बताते हुए अपना बचाव किया, मासस विधायक ने इससे इंकार करते हुए और भी हास्यास्पद खुलासा किया कि उसने अपना वोट, भाजपा नहीं, कांग्रेस के धीरज प्रसाद साहू के पक्ष में दिया था.

चटर्जी ने राष्ट्रपति और मुख्य निर्वाचन अधिकारी को अपना वोट सार्वजनिक करने के लिए आवेदन भी किया है. यह जानते हुए भी कि विधायक का वोट सार्वजनिक करने का अधिकार सिर्फ विधानसभा अध्यक्ष का है, चटर्जी ने जानबूझकर उसे अब तक कोई निवेदन नहीं दिया है.

Sunday, 25 March 2018

फासीवाद विरोधी संयुक्त मोर्चे का प्रश्न और हमारे कार्यभार

- राजेश त्यागी/ २४.३.२०१८ 

इस दौर में, जबकि दशकों से दक्षिणपंथ की ओर झुकते बुर्जुआ गणतंत्र, फासीवाद को स्वेच्छा से रास्ता दे रहे हैं, फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष, सर्वहारा क्रान्ति के एजेंडे पर सर्वोच्च स्थान ले लेता है.

फासीवाद से लड़ने का प्रश्न, नया नहीं है. इसका अपना एक सदी से अधिक का इतिहास है और उस इतिहास के ठोस अनुभव भी हैं. साथ ही जो परिस्थितियां आज मौजूद हैं, जिनके भीतर इस प्रश्न से हम जूझ रहे हैं, वे अपनी विशिष्टता लिए हुए हैं. कल और आज के बीच एक लय है, एक निरंतरता है, बावजूद इसके कि हर परिप्रेक्ष्य अपनी विलग विशिष्टता लिए है. इसलिए इतिहास के संघर्षों से रणनीतिक निष्कर्ष निकालते हुए, हमें आज के ठोस सन्दर्भ में इस प्रश्न को हल करना है.

आज के विशिष्ट राजनीतिक सन्दर्भ में जिन बिन्दुओं को दृष्टिगत रखने की जरूरत है, उनमें सबसे पहले तो विश्व परिप्रेक्ष्य है जिसमें, जैसा हमने ऊपर कहा कि दशकों से गल-सड़ रहे और दक्षिण की ओर झुकते जा रहे बुर्जुआ गणतंत्र, फासीवाद को स्वेच्छा से राह दे रहे हैं. फासीवाद का उभार, राष्ट्रीय नहीं, अंतर्राष्ट्रीय परिघटना है.

Thursday, 22 March 2018

वाम आन्दोलन की एकता और राजनीतिक संघर्ष का प्रश्न

- वर्कर्स सोशलिस्ट पार्टी / २३.३.२०१८

स्तालिनवादियों और दूसरे तमाम छद्म-वामियों ने, जिनके विरुद्ध WSP ने समझौताहीन राजनीतिक संघर्ष छेड़ा है, बारम्बार हम पर यह कहते हुए आरोप लगाए हैं कि हमारे द्वारा छेड़े गए इस संघर्ष के चलते वाम एकता कमज़ोर हो रही है. इस प्रश्न पर विचार करना इसलिए बहुत ज़रूरी है चूंकि यह प्रश्न समूचे आन्दोलन को प्रभावित करता है. जिस कार्रवाई से वाम एकता कमज़ोर हो रही है, वह कार्रवाई किसी भी तरह क्रान्तिकारी नहीं हो सकती बल्कि प्रतिक्रांतिकारी ही होगी.

छद्म-वाम, जिसमें मुख्यतः स्तालिनवादी शामिल हैं, के विरुद्ध, हमारे राजनीतिक संघर्ष का समूचे वाम आन्दोलन और क्रान्तिकारी संघर्ष के साथ क्या सम्बन्ध है और वह उसे किस तरह प्रभावित करता है, इस प्रश्न पर तुरंत संजीदगी से विचार किया जाना चाहिए.

Wednesday, 21 March 2018

भाकपा-माले का मानसा सम्मलेन और उसकी अपील, दक्षिणपंथ की ओर खुले झुकाव की उद्घोषणा है!

रजिंदर कुमार एवं सौरव भट्टाचार्य/ २१.३.२०१८ 


भाकपा-माले पंजाब के मानसा में पार्टी का १०वां सम्मलेन करने जा रही है. इस सम्मलेन की दिशा तय करते हुए इसने जो अपील जारी की है, वह है- “फासीवाद को हराओ! जनता का भारत बनाओ!”

यह अपील, स्तालिनवादी भाकपा-माले की कुल राजनीति के अनुरूप होने के साथ-साथ, और वर्तमान में उसकी व्यावहारिक जरूरतों के भी अनुरूप है.

बिहार के कुछ पिछड़े, किसानी जिलों में प्रभाव क्षेत्र वाली भाकपा-माले, शहरी मजदूर वर्ग से, मजदूर वर्ग के हिरावल से पूरी तरह कटी रही है और इन किसानी क्षेत्रों में जाति और क्षेत्रवाद से लबरेज़ संकीर्ण समीकरणों से अपनी जड़ों को पोषित करती रही है. इस प्रक्रिया में, विशेष रूप से पिछले तीन दशकों में यह अधिक से अधिक दक्षिण की ओर हटती चली गई है.

Thursday, 15 March 2018

महाराष्ट्र में किसान आन्दोलन, पूंजीवाद के तहत गहराते कृषि-संकट की चेतावनी है!

राजेश त्यागी/ १४.३.२०१८

महाराष्ट्र सरकार द्वारा, प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही, किसानों की सभी मांगे लिखित में स्वीकार लिए जाने पर, किसान आन्दोलन वापस ले लिया गया है. महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में रैली के उद्देश्य से पहुंचे किसान वापस लौट गए हैं.

दक्षिणी मुंबई के आज़ाद मैदान में जमा हुए लगभग ४० हज़ार किसानों ने, नासिक से मुंबई तक १८० किलोमीटर का फासला, छह दिन के पैदल मार्च में तय किया था.